Skip to content
कहानी

प्रोजेक्ट आईडीआई का समन्वय: कार्य क्षेत्र से एक दृष्टिकोण

प्रोजेक्ट आईडीआई के समन्वयक और उनके अनुभवों को जानिये।

समुदाय में बच्चों और परिवारों के साथ प्रोजेक्ट आईडीआई के समन्वयकों की छवियां। पाठ्य में लिखा है:

सरकारी अधिकारियों के साथ बैठक।  समुदायों में जागरूकता बढ़ाना। माता-पिता और परिवारों को परामर्श। दिव्यांगता प्रमाण पत्र या सहायक उपकरण को प्राप्त कर उसका उपयोग करना, इसके लिए परिवारों का मार्गदर्शन करना। दिव्यांगता से ग्रस्त बच्चों के पाठशाला में नामांकन के लिए समर्थन करना। और ऐसी कई जिम्मेदारियां हैं जो प्रोजेक्ट आईडीआई के समन्वयक हर दिन निभाते हैं, और इस प्रोजेक्ट द्वारा जो काम करना है वह  समयानुकूल हो इसके लिए वह अथक काम करते हैं, और कई बहुदिव्यांगता और दृष्टिदिव्यांगता (एमडीवीआई) से ग्रस्त बच्चों को नए अवसर प्रदान करते हैं।

एक साक्षात्कार में, पर्किन्स इंडिया के प्रोजेक्ट आईडीआई के दो समन्वयकों ने अपने अनुभव को साझा किया कि वे इस प्रोजेक्ट का हिस्सा क्यों हैं और वे इस काम में रुचि क्यों रखते हैं। मुकेश वर्मा, जयति भारतम् (लखनऊ) के कार्यक्रम समन्वयक, और डॉ.श्रॉफ चैरिटी आई हॉस्पिटल (वृंदावन) में परियोजना अधिकारी उमेश सिंह रावत (वृंदावन) को अपने काम के बारे में क्या कहना है, यह जानने के लिए पढ़िए।

जिन समुदायों में आप काम करते हैं, उनके लिए प्रोजेक्ट आईडीआई का सबसे महत्वपूर्ण योगदान क्या रहा है?

मुकेश: इस प्रोजेक्ट की वजह से हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि एमडीवीआई से ग्रस्त कई बच्चों की शिक्षा तक पहुंच हो। एमडीवीआई से ग्रस्त बच्चों के माता-पिता उनके दिन-प्रतिदिन के जीवन में कई सारी चुनौतियों का सामना करते हैं और प्रोजेक्ट आईडीआई की वजह से, हम उन्हें सामूहिक रूप से चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं और उन्हें अपने बच्चे के हस्तक्षेप कार्यक्रम में समर्थन और भाग लेने के लिए मार्गदर्शन भी कर सकते हैं। माता-पिता को यह भी एहसास होता है कि उनके बच्चे सीख सकते हैं और उनकी स्तिथि में परिवर्तन हो सकता हैं और अब वे प्रोजेक्ट आईडीआई की टीम के सदस्यों को आशा की एकमात्र किरण के रूप में देखते हैं।

उमेश: वृन्दावन / मथुरा के समुदायों मे प्रोजेक्ट आईडीआई के द्वारा ऍमडीवीआई बच्चो मे अप्रत्यासित परिवर्तन देखनो को मिला जिनको कि समाज मे वंचितों श्रेणी मे गिना जाता था। आज प्रोजेक्ट कि क्रियाशीलता से ऐसे बच्चो के प्रति समाज मे जागरूकता का संचार हो रहा है जो कि प्रोजेक्ट के लिए गौरव का विषय है।

समुदाय में काम करने के दौरान आपको किस तरह की चुनौतियाँ का सामना करना पड़ता है?

मुकेश: जब हमने समुदाय में काम शुरू किया तो हमने महसूस किया कि दिव्यांगता से संबंधित समुदाय में जागरूकता की कमी थी और समुदाय के सदस्यों को एमडीवीआई या इन बच्चों की जरूरतों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। किसी को भी यह अंदाजा नहीं था कि ये बच्चे नियमित शैक्षिक सहायता और हस्तक्षेप के माध्यम से कई कौशल सीख सकते हैं।

साथ ही समुदाय के कई लोगों को अतीत में कुछ संगठनों के साथ अप्रिय अनुभव हुआ जिन्होंने समर्थन देने का वादा किया; परन्तू, प्रारंभिक संपर्क से परे बच्चों को कोई सहायता प्रदान नहीं की। इसके कारण, शुरू में हमें बहुत प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। भरोसा पैदा करना सबसे बड़ी चुनौती थी। हमारे निरंतर प्रयासों और प्रगति के साथ बच्चों में जो परिवर्तन हुआ उसे परिवार और समुदाय ने देखा, अब समुदाय से बहुत अधिक स्वीकृति और सहयोग है।

आपने समुदाय के अन्य संगठनों के साथ मिलकर कैसे काम किया है?

उमेश: समुदाय से  दिव्याग बच्चो के लिए  भिन्न भिन्न दिव्यन्गता पर कार्य करने वाले निजी संघठनो व सरकारी विभागों  से हमें निरंतर सहयोग मिल रहा है (स्वास्थ्य विभाग ,शिक्षा विभाग, विकलांग विभाग आदि )। उनके सहयोग से हम जैसे सर्टिफिकेट बनवाना ,सहायक उपकरण दिलवाने मे मदद करना ,स्कूल नामांकित न होने वाले बच्चो को स्कूल मे नामांकित करना ,हाथ और पैरो से अक्षम बच्चो को जिनमें फिजियोथेरेपी से सुधार हो सकता है ऐसे बच्चो को  फिजियोथेरेपी सेण्टर से जोड़ना। समुदाय में मौजूद आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की मदद से हम दिव्यांग बच्चों खासकर एमडीवीआई के कई बच्चों तक पहुंचने में सक्षम हुए हैं हुए हैं। ये स्वास्थ्य कार्यकर्ता, समुदायों में जागरूकता पैदा करने में भी काफी मदद कर रहे हैं।

क्या आपने प्रोजेक्ट आईडीआई के माध्यम से सभी कार्यों के परिणामस्वरूप विकलांगता के प्रति समुदाय के लोगों की धारणा या दृष्टिकोण में कोई बदलाव देखा है?

उमेश: निश्चित ही प्रोजेक्ट आईडीआई के माध्यम से दिव्यांगता के प्रति समुदाय के लोगों की धारणा या दृष्टिकोण में क्रातिकारी परिवर्तन देखनो को मिल रहा है  और हम प्रोजेक्ट के उद्देश्यों को सफल बनाने कि दिशा मे  निरंतर आगे अग्रसर हो रहे है।

इसके लिए मे आपको के एक उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हु। रश्मि एक बहुदिव्यांग बच्ची है जो कि आज हमारे प्रोग्राम मे, ऍमडीवीआई के रूप मे नामांकित है। शुरुआती दिनों मे रश्मि के माता पिता रश्मि की विकलांगता को अभिशाप के रूप मे देखते थे। लेकिन रश्मि के हमारे प्रोग्राम से जुड़ने के बाद हमारी टीम ने उसके साथ काम करना शुरु किया तो हमारी टीम के कार्य व मेहनत को देखकर उनकी दिव्यन्गता के प्रति सोच मे भी परिवर्तन देखनो को मिला है। जो कि पहले बच्ची को हमारे प्रोग्राम मे नामांकित नही करना चाहते थे आज वो हमारी टीम को पूर्ण सहयोग कर रहे है जो कि हमारे प्रोग्राम के लिए सकारात्मकता का घोतक है ।

आपको यह काम करने के लिए क्या प्रेरित करता है?

मुकेश: जब मैं प्रोजेक्ट आईडीआई के कारण माता-पिता को मिली संतुष्टि और आत्मविश्वास को देखता हूं तो मुझे बहुत प्रेरणा मिलती है। यह मुझे और अधिक उत्साह और प्रतिबद्धता के साथ अपना काम करने के लिए प्रेरित करता है। मैं आभारी महसूस करता हूं कि मैं कई परिवारों को दिन-प्रतिदिन के जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करने में सहायता प्रदान कर सकता हूं और उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए उनका समर्थन करता हूं। मैं सौभाग्यशाली हूं कि मैं वास्तव में किसी के जीवन में बदलाव ला सकता हूं और मैं इन सभी बच्चों और परिवारों और पूरे समुदाय को कई तरीकों से समर्थन करने का अवसर पाकर आभारी हूं।

इस परियोजना में समन्वयक के रूप में काम करते हुए आपने कौन सी महत्वपूर्ण चीजें सीखी हैं?

मुकेश: मैंने एक टीम के रूप में एक साथ काम करने और बच्चों और उनके परिवारों तक किसी भी तरह से पहुंचने के लिए एक-दूसरे का समर्थन करने के संदर्भ में बहुत कुछ सीखा। मैंने गतिविधियों को उचित रूप से योजना बनाकर फिर उन्हें समुदाय में लागू करना सीखा, ताकि बच्चों और उनके परिवारों को उनकी जरूरत की हर चीज तक पहुंच हो।

उमेश: इस प्रोग्राम के द्वारा दिव्यांग बच्चो के जीवन की कठिनाइयों को करीब से महसूस किया है। मेरे अंदर यह भाव जाग्रत हुआ कि मुझे समाज मे दिव्यन्गता अभिशाप नही के प्रति लोगो को हमेशा जागरूक करते रहना है।

इन प्रोजेक्ट आईडीआई के समन्वयकों के योगदान और उनके टीमों के योगदान के लिए धन्यवाद, जिसकी बदौलत एमडीवीआई से ग्रस्त सैकड़ों बच्चे सीखने और उन्नति के नए अवसर प्राप्त कर रहे हैं।

SHARE THIS ARTICLE
एमडीवीआई से ग्रस्त बच्चे और उनके शिक्षक शरबतपुर सामुदायिक हस्तक्षेप केंद्र के सामने खड़े हुए हैं।
कहानी

सीतापुर में नया स्थापित हस्तक्षेप केंद्र- एक उम्मीद ले कर आया है

आशा कार्यकर्ताएं एक ऍमडीवीआई से ग्रस्त बच्चे के पास बैठीं हैं जिसने हाथ में खिलौनों को पकड़ रखा है।
कहानी

सीतापुर में एक नये प्रशिक्षण कार्यक्रम ने अनेक एमडीवीआई से ग्रस्त बच्चों के लिए शैक्षिक अवसर निर्माण हुए।

रंगीन चक्र के साथ दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों का प्रतीक चिन्ह
कहानी

संयुक्त राष्ट्र ने पर्किन्स इंडिया के प्रोजेक्ट आईडीआई (पहचानऔर हस्तक्षेप परियोजना ) को वैश्विक लक्ष्यों की ओर अच्छे आचरण के रूप में मान्यता दी है।