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एमडीवीआई से ग्रस्त बच्चों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं और शैक्षणिक सेवाओं को जोड़ना।

दूरस्त्र क्षेत्रों में एमडीवीआई (MDVI) से ग्रस्त बच्चों की प्रारंभिक पहचान और उनकी सहायता के लिए पार्किंस इंडिया ने श्रॉफ के चैरिटी आई हॉस्पिटल के साथ सहभा

प्रारंभिक हस्तक्षेप  सत्र के दौरान एक बच्चा पैटर्न वाले  कागज़  की ओर इशारा कर रहा है।

एक बच्चा लाल गेंद तक पोहोंच पा रहा है । एक शिशु पहली बार रोशनी को देखने के लिए अपना सर रोशनी की ओर घुमाता है। एक माँ और बच्चा पहली बार आँखों से संपर्क स्थापित करते हैं।

ये छोटे लगने वाले सभी क्षण वास्तव में पार्किंस इंडिया के सहभागी  डॉ.श्रॉफ चैरिटी आई हॉस्पिटल, वृन्दावन केन्द्र के नए प्रारंभिक हस्तक्षेप केन्द्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं। भारतवर्ष के बहु दिव्यांगता एवं दृष्टि दिव्यांगता से ग्रस्त बच्चों (MDVI) की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए आईडीआई योजना (Identification and Intervention) के तहत श्रॉफ चैरिटी आई हॉस्पिटल, वृन्दावन केन्द्र आरम्भ किया गया है।  सम्पूर्ण भारत के बहु दिव्यांगता एवं दृष्टि दिव्यांगता से ग्रस्त बच्चों (MDVI) की पहचान के लिए यह एक पहल है, और यह सुनिश्चित किया जाता हैं कि स्कूल जाने के लिए पूर्व तैयारी के रूप में उन्हें प्रारंभिक हस्तक्षेप सेवाएं उपलब्ध हो।

यह नया प्रारंभिक हस्तक्षेप केंद्र दृष्टि दिव्यांगता से ग्रस्त छात्रों की ज़रूरतों को संभोदित करने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। पंजीकृत परिवार चिकित्सीय पेशेवरों, पुनर्वास कार्यकर्ताओं और प्रारंभिक हस्तक्षेप विशेषज्ञों से सम्पर्क कर सकते हैं, जो बच्चे के समावेशी विकास में सहायक होते हैं। देखभाल करने वाले कर्मचारी, माता पिता को राहत और आराम पहुँचाते हैं।एससीईऐच (SCEH) की अनुभवी हस्तक्षेप विशेषज्ञ मधुमती बोस के अनुसार “ अब माता पिता को लगता है कि उनके बच्चे को समझने वाला कोई है जो उनका मार्गदर्शन कर सकता है।” उन्होंने लक्षित किया है कि वे माता पिता  अपने दृष्टि दिव्यांगता से ग्रस्त बच्चे के लिए परेशान रहते हैं और उसके भविष्य को ले कर बहुत ही रक्षात्मक रहते हैं तथा जानना चाहते हैं कि बच्चे की वृद्धि और विकास के लिए वे क्या करें।

प्रारंभिक हस्तक्षेप सत्र के दौरान एक बच्चा और उसकी माँ बैठे हुए ।

केन्द्र बच्चों के प्रारंभिक विकास पर ध्यान केन्द्रित करते हुए जहाँ तक हो सके दैनिक दिनचर्या के प्रति स्वावलंबन और कौशल विकास के लिए बच्चों की सहायता और विकास के लिए आशा की किरण ले कर आया है। उदाहरण के लिए पुनर्वास कार्यकर्ता संवेदी प्रोत्साहन (सेंसरी स्टिमुलेशन) के लिए कार्य करते हैं जो शिशु छोटे बच्चे और जन्म से तीन या चार वर्ष के शिशु के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है। वे माता पिता का मार्गदर्शन भी करते हैं कि वे इन गतिविधियों में शामिल हों और यथा संभव घर पर भी इसे करें।

एक बच्चा प्रारंभिक हस्तक्षेप सत्र के दौरान प्रकाश और चावल के साथ खेल रहा है।
 एक बच्चा हाथों पर शेविंग क्रीम लगाकर खेल रहा है।

वृन्दावन में प्रारंभिक हस्तक्षेप केन्द्र प्रोजेक्ट आईडीआई मॉडल (Project IDI model)  का महत्वपूर्ण घटक है जिसे पार्किंस इंडिया और डॉ.श्रॉफ चैरिटी आई हॉस्पिटल दोनों मिल कर संचालित कर रहे हैं। पार्किंस  इंडिया और एससीईऐच  (SCEH) एक साथ मिल कर समुदाय आधारित पुनर्वास कार्यकर्ता  (CBR) और आशा तथा आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को प्रशिक्षित कर रहे हैं जो वृन्दावन केन्द्र के प्रारंभिक हस्तक्षेप कर्मचारियों के साथ समन्वय से काम करेंगे।

बोस का मानना है कि ग्रामीण इलाकों के बहुदिव्यांग बहु दिव्यांगता से ग्रस्त बच्चों के लिए ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता एक आशीर्वाद हैं” हैं। इसके अतिरिक्त समुदाय आधारित पुनर्वास कार्यकर्ता (CBR)  से आशा की जाती है कि वे केन्द्र की संवहनीयता के लिए काम करें और अधिक से अधिक परिवारों तक पहुँचे, खास करके उन परिवारों तक जो ग्रामीण इलाकों में रहते हैं और जिनकी चिकित्सा या पुनर्वास सेवाओं तक सीमित पहुँच है।

एससीईऐच (SCEH) के सहयोगी के रूप में पार्किंस इंडिया, दशकों से विश्व भर में सम्मानित,  अपने तकनीकी अनुभव के साथ तकनीकी विशेषज्ञता और कार्य पद्धतियों को ले कर आया है। बोस का कहना है कि यह सहभागिता उनकी संस्था को आधुनिक तकनीक और सहायता विधियों में समसामयिक बने रहने में सहायक है तथा इस प्रकार के कार्य की आवश्यकता को समझने और भारत में इस प्रकार के उपक्रम की स्थापना में सहयोगी है।

एससीईऐच (SCEH) के साथ सहभागिता का प्रबंधन करने वाली पार्किंस इंडिया  की प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर सुप्रिया दास ने बोस के दिव्यांगता से ग्रस्त बच्चों के प्रति समर्पण और बच्चों तथा परिवारों पर आईडीआई योजना के संभावित प्रभाव के प्रति उनकी उत्सुकता को साझा किया है । “यह केवल स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्रों की आपसी सहभागिता से ही संभव है कि दृष्टि दिव्यांगता एवं बहु दिव्यांगता से ग्रस्त बच्चे अपनी क्षमता के पूर्ण विकास का अवसर प्राप्त कर पाएंगे ।” 

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